ज्यों निकलकर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फ़िर फ़िर यही मन में लगी
आह क्यूँ घर छोड़कर मैं यों बढ़ी
देव मेरे भाग्य मैं है क्या वदा
मैं बचूंगी या मिलूँगी धूल में
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी
चू पडूँगी या कमल के फूल में
वह गई उस काल कुछ ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुंदर सीप का मुंह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी
लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किंतु घर का छोड़ना अकसर उन्हे
बूँद लौ कुछ और ही देता है कर
अयोध्या सिंह हरिऔध
Through this blog I have tried to collect various Hindi poems and essays which we grew up reading in our schools.
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
मुरझाया फूल

था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन
हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन
खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर
लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे आने भ्रमर
स्निग्ध किरनें चाँद की, तुझको हंसाती थी सदा,
रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा
लोरियां गा कर मधुप निद्रा-विवश करते तुझे
यत्न माली का रहा आनंद से भरता तुझे
कर रहा अठखेलियाँ इतरा रहा उद्यान में
अंत का ये दृश्य आया था कभी क्या ध्यान में?
सो रहा अब तू धरा पर, शुष्क बिखराया हुआ
गंध कोमलता नहीं, मुख मंजु मुरझाया हुआ
आज तुझको देखकर चाहक भ्रमर आता नहीं
लाल अपना राग तुझपर प्रात बरसाता नहीं
जिस पवन ने अंक में ले प्यार तुझको था किया
तीव्र झोकों से सुला उसने तूझे भू पर दिया
कर दिया मधु और सौरभ दान सारा एक दिन
किंतु रोता कौन हैं तेरे लिए दानी सुमन
मत व्यथित हो फूल, सुख किसको दिया संसार ने
स्वार्थमय सबको बनाया है यहाँ करतार ने
विश्व मैं हे फूल! तू सबके ह्रदय भाता रहा
दान कर सर्वस्व फ़िर भी हाय! हर्साता रहा
जब ना तेरी ही दशा पर दुःख हुआ संसार को
कौन रोयेगा सुमन हमसे मनुज निःसार को
महादेवी वर्मा
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