मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

एक बूँद

ज्यों निकलकर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फ़िर फ़िर यही मन में लगी
आह क्यूँ घर छोड़कर मैं यों बढ़ी

देव मेरे भाग्य मैं है क्या वदा
मैं बचूंगी या मिलूँगी धूल में
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी
चू पडूँगी या कमल के फूल में

वह गई उस काल कुछ ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुंदर सीप का मुंह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी

लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किंतु घर का छोड़ना अकसर उन्हे
बूँद लौ कुछ और ही देता है कर

अयोध्या सिंह हरिऔध

मुरझाया फूल


था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन

हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन

खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर

लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे आने भ्रमर


स्निग्ध किरनें चाँद की, तुझको हंसाती थी सदा,

रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा

लोरियां गा कर मधुप निद्रा-विवश करते तुझे

यत्न माली का रहा आनंद से भरता तुझे


कर रहा अठखेलियाँ इतरा रहा उद्यान में

अंत का ये दृश्य आया था कभी क्या ध्यान में?

सो रहा अब तू धरा पर, शुष्क बिखराया हुआ

गंध कोमलता नहीं, मुख मंजु मुरझाया हुआ


आज तुझको देखकर चाहक भ्रमर आता नहीं

लाल अपना राग तुझपर प्रात बरसाता नहीं

जिस पवन ने अंक में ले प्यार तुझको था किया

तीव्र झोकों से सुला उसने तूझे भू पर दिया


कर दिया मधु और सौरभ दान सारा एक दिन

किंतु रोता कौन हैं तेरे लिए दानी सुमन

मत व्यथित हो फूल, सुख किसको दिया संसार ने

स्वार्थमय सबको बनाया है यहाँ करतार ने


विश्व मैं हे फूल! तू सबके ह्रदय भाता रहा

दान कर सर्वस्व फ़िर भी हाय! हर्साता रहा

जब ना तेरी ही दशा पर दुःख हुआ संसार को

कौन रोयेगा सुमन हमसे मनुज निःसार को


महादेवी वर्मा