बुधवार, 12 अगस्त 2009

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

प्रिय मित्रों स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में....................


सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद, आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
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रहबर - Guide
लज्जत - tasteful
नवर्दी - Battle
मौकतल - Place Where Executions Take Place, Place of Killing मिल्लत - Nation, faith

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Many people have asked me about the lyrics used in the movie 'Rang De Basanti'. Here it goes -- though remember these lines are not part of the original poem written by 'Ram Prasad Bismil'.

है लिये हथियार दुश्मन ताक मे बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिनमें हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से और भडकेगा जो शोला सा हमारे दिल में है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न जान हथेली में लिये लो बढ चले हैं ये कदम जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल मैं है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब होश दुश्मन के उडा देंगे हमे रोको न आज दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल मे है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


पंडित राम प्रसाद बिस्मिल

देश की धरती



मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

मॉं तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल में जब भी
कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण

गान अर्पित, प्राण अर्पित
रक्त का कण-कण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

मॉंज दो तलवार को, लाओ न देरी
बॉंध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया धनेरी

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो
गॉंव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो

सुमन अर्पित, चमन अर्पित
नीड़ का तृण-तृण समर्पित
चहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ


राम अवतार त्यागी

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

मेरा नया बचपन


बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी |
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी ||
चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वछंद?
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

उंच नीच का ज्ञान नही था , छुआ छूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहां झोपडी और चीथड़ों में रानी ||
किए दूध के कुल्ले मैंने चूस अंगूठा सुधा पीया |
किलकारी किल्लोर मचाकर सूना घर आबाद किया ||

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे |
बड़े बड़े मोती से आंसू जय माला पहनाते थे ||
मैं रोई, मां काम छोड़कर आई, मुझको उठा लिया |
झाड़ फूंक कर चूम चूम गीले गलों को सुखा दिया ||


दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर- युत दमक उठे |
धुली हुई मुस्कान देखकर सबके चहरे चमक उठे ||
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई |
लुटी हुई कुछ ठगी हुई सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई ||


लाज भरी आँखें थी मेरी मन में उमंग रंगीली थी |
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी ||
मन में एक उमंग सी भी थी ये दुनिया अलबेली थी |
दिल में एक चुभन सी थी मैं सबके बीच अकेली थी ||

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने |
अरे जवानी के फंदे में मुझको फंसा दिया तूने ||
सब गलियां उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं |
प्यारे प्रीतम की स्म्रतियों की रंग रलियाँ भी प्यारी है ||

माना मैंने युवा काल का जीवन खूब निराला है |
आकांशा पुरुसार्थ ज्ञान का उदय मोहने वाला है
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध छेत्र संसार बना |
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना ||

आ जा बचपन ! एक बार फ़िर दे दे अपनी निर्मल शान्ति |
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली बह अपनी प्राकृत विश्रांति ||
वह भूली सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप |
क्या आकर फ़िर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?


मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी |
नंदन वन सी फूल उठी वह नन्ही सी कुटिया मेरी ||
'मां ओ' कह कर बुला रही थी मिटटी खा कर आई थी |
कुछ मुह में कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने आई थी ||

पुलक रहे थे अंग द्रगों में कौतुहल था छलक रहा |
मुहं पर थी आह्लाद लालिमा विजय गर्व था झलक रहा ||

मैंने पूछा ये क्या लाई बोल उठी 'माँ काओ' |
हुआ प्रफुल्लित ह्रदय खुशी से मैंने कहा-' तुम्ही खाओ' ||

पाया मैंने बचपन फ़िर से बचपन बेटी बन आया |
उसकी मंजुल मूर्ती देख कर मुझ में नव जीवन आया ||

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ |
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ ||

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया |
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फ़िर से आया ||


सुभद्रा कुमारी चौहान

बहन की राखी


रोली अक्षत से भरा हुआ एक सुंदर थाल था सजवाया
चौमुखा जलाकर दीप भी था एक सुंदर ढंग से रखवाया
वोली बेटी तू भी आ जा, सीमा पर भइया जाता है
भारत मां की रक्षा के हित वह दृढ संकल्प उठाता है

आओ हम उसका तिलक करें, वह भगत सिंह बन जाएगा
नेता सुभाष सा बन कर वह भारत की लाज बचायेगा


ये सुनकर बेटा कूद पड़ा, रण में मैं प्रलय मचाउंगा
माता तुम मत हो अधीर में तेरा दूध चुकाउंगा


कायर बन कर जीना भी क्या ,जीना भी कोई जीना है
सीने पर जिसके बाल नहीं क्या वह भी कोई सीना है
कर में जिसके तलवार नहीं, कर नहीं वह एक खिलौना है
है देश से जिसको प्यार नहीं इंसान नहीं वह छौना है

यह सुनकर बेटी वोल पड़ी मेरी राखी वह बंधन है
दुश्मन के शिर का काल है यह, और भारत माँ का चंदन है
कर रही तिलक भइया तेरे जा तुझ पर आंच ना आयेगी
भारत मां की रक्षा के हेतु रण चंडी साथ निभाएगी

बहन से राखी बंधवाकर निज ग्राम को शीश नवाता है
इस तरह विदा मां बहन से ले वह देश दीवाना जाता है