शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

बहन की राखी


रोली अक्षत से भरा हुआ एक सुंदर थाल था सजवाया
चौमुखा जलाकर दीप भी था एक सुंदर ढंग से रखवाया
वोली बेटी तू भी आ जा, सीमा पर भइया जाता है
भारत मां की रक्षा के हित वह दृढ संकल्प उठाता है

आओ हम उसका तिलक करें, वह भगत सिंह बन जाएगा
नेता सुभाष सा बन कर वह भारत की लाज बचायेगा


ये सुनकर बेटा कूद पड़ा, रण में मैं प्रलय मचाउंगा
माता तुम मत हो अधीर में तेरा दूध चुकाउंगा


कायर बन कर जीना भी क्या ,जीना भी कोई जीना है
सीने पर जिसके बाल नहीं क्या वह भी कोई सीना है
कर में जिसके तलवार नहीं, कर नहीं वह एक खिलौना है
है देश से जिसको प्यार नहीं इंसान नहीं वह छौना है

यह सुनकर बेटी वोल पड़ी मेरी राखी वह बंधन है
दुश्मन के शिर का काल है यह, और भारत माँ का चंदन है
कर रही तिलक भइया तेरे जा तुझ पर आंच ना आयेगी
भारत मां की रक्षा के हेतु रण चंडी साथ निभाएगी

बहन से राखी बंधवाकर निज ग्राम को शीश नवाता है
इस तरह विदा मां बहन से ले वह देश दीवाना जाता है

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