ज्यों निकलकर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फ़िर फ़िर यही मन में लगी
आह क्यूँ घर छोड़कर मैं यों बढ़ी
देव मेरे भाग्य मैं है क्या वदा
मैं बचूंगी या मिलूँगी धूल में
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी
चू पडूँगी या कमल के फूल में
वह गई उस काल कुछ ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुंदर सीप का मुंह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी
लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किंतु घर का छोड़ना अकसर उन्हे
बूँद लौ कुछ और ही देता है कर
अयोध्या सिंह हरिऔध
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जवाब देंहटाएंHey buddy, nice collection of poems,hope to see some more best collection.
जवाब देंहटाएंGood Dear, Lage raho hum tumahre sath hai
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