मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

तुलसी और रत्ना

तन पुलकित था तुलसी का, सोचा विनोद में आकर
मैं सावधान कर दूंगा , रत्ना को घर पर जा कर
इस गोधूली वेला में, वदराह बादलों के दल
आये हैं आज चुराने, तेरे नयनो का काजल

पर घर जा कर तुलसी का, बढ़ गया विरह दूना था
अन्दर बाहर क्या घर का, कोना कोना सूना था
रत्ना चिल्लाये तुलसी, पगलों से मतवालों से
पर ध्वनि प्रति-ध्वनि बन लौटी, टकरा कर दीवारों से

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें