मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

जलियाँवाला बाग में बसंत

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

सुभद्रा कुमारी चौहान

कदम्ब का पेंड


यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्‍हैया बनता धीरे धीरे
ले देती यदि मुझे तुम बांसुरी दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली


तुम्‍हें नहीं कुछ कहता, पर मैं चुपके चुपके आता
उस नीची डाली से अम्‍मां ऊंचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मज़े से मैं बांसुरी बजाता
अम्‍मां-अम्‍मां कह बंसी के स्‍वरों में तुम्‍हें बुलाता


सुन मेरी बंसी मां, तुम कितना खुश हो जातीं
मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आतीं
तुमको आती देख, बांसुरी रख मैं चुप हो जाता
एक बार मां कह, पत्‍तों में धीरे से छिप जाता


तुम हो चकित देखती, चारों ओर ना मुझको पातीं
व्‍या‍कुल सी हो तब, कदंब के नीचे तक आ जातीं
पत्‍तों का मरमर स्‍वर सुनकर,जब ऊपर आंख उठातीं
मुझे देख ऊपर डाली पर, कितनी घबरा जातीं


ग़ुस्‍सा होकर मुझे डांटतीं, कहतीं नीचे आ जा
पर जब मैं ना उतरता, हंसकर कहतीं मुन्‍ना राजा
नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्‍हें मिठाई दूंगी
नये खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी


मैं हंसकर सबसे ऊपर की डाली पर चढ़ जाता
वहीं कहीं पत्‍तों में छिपकर, फिर बांसुरी बजाता
बुलाने पर भी जब मैं ना उतरकर आता
मां, तब मां का हृदय तुम्‍हारा बहुत विकल हो जाता


तुम आंचल फैलाकर अम्‍मां, वहीं पेड़ के नीचे
ईश्‍वर से विनती करतीं, बैठी आंखें मीचे
तुम्‍हें ध्‍यान में लगी देख मैं, धीरे धीरे आता
और तुम्हारे आंचल के नीचे छिप जाता


तुम घबराकर आंख खोलतीं,
और मां खुश हो जातीं
इसी तरह खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे ।।

सुभद्रा कुमारी चौहान

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

तुलसी और रत्ना

तन पुलकित था तुलसी का, सोचा विनोद में आकर
मैं सावधान कर दूंगा , रत्ना को घर पर जा कर
इस गोधूली वेला में, वदराह बादलों के दल
आये हैं आज चुराने, तेरे नयनो का काजल

पर घर जा कर तुलसी का, बढ़ गया विरह दूना था
अन्दर बाहर क्या घर का, कोना कोना सूना था
रत्ना चिल्लाये तुलसी, पगलों से मतवालों से
पर ध्वनि प्रति-ध्वनि बन लौटी, टकरा कर दीवारों से

फूल और काँटा

हैं जन्म लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता ।
मेह उन पर है बरसता एक सा,
एक सी उन पर हवाएँ हैं बहीं
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक से होते नहीं ।
छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ,
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भँवर का है भेद देता श्याम तन ।
फूल लेकर तितलियों को गोद में
भँवर को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगन्धों और निराले ढंग से
है सदा देता कली का जी खिला ।
है खटकता एक सबकी आँख में
दूसरा है सोहता सुर शीश पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम
दे जो किसी में हो बड़प्पन की कसर ।

रचनाकार: अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

एक तिनका

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,
एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।
मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे,
ऐंठ बेचारी दबे पॉंवों भागने लगी।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया,
तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

रचनाकार: अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

एक बूँद

ज्यों निकलकर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फ़िर फ़िर यही मन में लगी
आह क्यूँ घर छोड़कर मैं यों बढ़ी

देव मेरे भाग्य मैं है क्या वदा
मैं बचूंगी या मिलूँगी धूल में
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी
चू पडूँगी या कमल के फूल में

वह गई उस काल कुछ ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुंदर सीप का मुंह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी

लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किंतु घर का छोड़ना अकसर उन्हे
बूँद लौ कुछ और ही देता है कर

अयोध्या सिंह हरिऔध

मुरझाया फूल


था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन

हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन

खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर

लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे आने भ्रमर


स्निग्ध किरनें चाँद की, तुझको हंसाती थी सदा,

रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा

लोरियां गा कर मधुप निद्रा-विवश करते तुझे

यत्न माली का रहा आनंद से भरता तुझे


कर रहा अठखेलियाँ इतरा रहा उद्यान में

अंत का ये दृश्य आया था कभी क्या ध्यान में?

सो रहा अब तू धरा पर, शुष्क बिखराया हुआ

गंध कोमलता नहीं, मुख मंजु मुरझाया हुआ


आज तुझको देखकर चाहक भ्रमर आता नहीं

लाल अपना राग तुझपर प्रात बरसाता नहीं

जिस पवन ने अंक में ले प्यार तुझको था किया

तीव्र झोकों से सुला उसने तूझे भू पर दिया


कर दिया मधु और सौरभ दान सारा एक दिन

किंतु रोता कौन हैं तेरे लिए दानी सुमन

मत व्यथित हो फूल, सुख किसको दिया संसार ने

स्वार्थमय सबको बनाया है यहाँ करतार ने


विश्व मैं हे फूल! तू सबके ह्रदय भाता रहा

दान कर सर्वस्व फ़िर भी हाय! हर्साता रहा

जब ना तेरी ही दशा पर दुःख हुआ संसार को

कौन रोयेगा सुमन हमसे मनुज निःसार को


महादेवी वर्मा