मंगलवार, 30 जून 2009

पुष्प की अभिलाषा


चाह नही मैं सुरबाला के गहनों में गूथा जाऊँ
चाह नही प्रेमी माला में बिंध्य, प्यारी को ललचाऊं

चाह नहीं सम्राटों के शव, पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के शिर पर चढूं भाग्य पर इतराऊं

मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृ भूमि पर शीश चढाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक



माखन लाल चतुर्वेदी

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