मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
जानता हूँ इस जगत में फूल की है आयु कितनी ,
और यौवन की उभरती साँस में है वायु कितनी ,
आकाश का विस्तार सारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
जोड़ कर कण - कण कृपण आकाश ने तारे
सजाए,जो की उज्ज्वल हैं पर क्या किसी के काम आए ,
प्राण मैं तो मार्ग दर्शक बस एक तारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गयी जैसे दिशाएँ,
एक तरणी एक नाविक और कितनी आपदाएं ,
क्या करूं मझधार में ही मैं किनारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
राम कुमार वर्मा