गुरुवार, 18 मार्च 2010

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

जानता हूँ इस जगत में फूल की है आयु कितनी ,

और यौवन की उभरती साँस में है वायु कितनी ,

आकाश का विस्तार सारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

जोड़ कर कण - कण कृपण आकाश ने तारे

सजाए,जो की उज्ज्वल हैं पर क्या किसी के काम आए ,

प्राण मैं तो मार्ग दर्शक बस एक तारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गयी जैसे दिशाएँ,

एक तरणी एक नाविक और कितनी आपदाएं ,

क्या करूं मझधार में ही मैं किनारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

राम कुमार वर्मा

गुरुवार, 4 मार्च 2010

गब्बर: होली कब है

करे जब पांव खुद नर्तन, समझ लेना की होली है
हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना की होली है
इमारत एक पुरानी सी, रुके बरसों के पानी सी
लगे बीवी बही नूतन, समझ लेना की होली है
तरसती जिसके भी दीदार तक को आपकी आँखें
उसे छूने का आये छन, समझ लेना की होली है
हमारी जिंदगी यूँ तो है एक,काँटों भरा जंगल
अगर लगने लगे मधुवन, समझ लेना की होली है
कभी खोलो हुलसकर, आप अपने घर का दरवाजा
खड़े ढेअरी पर हो साजन, समझ लेना की होली है
बुलाये जब तुझे वो गीत गाकर ताल पर ढपकी
जिसे माना किये दुश्मन, समझ लेना की होली है


रचनाकार
नीरज

होली की मस्ती

पिलाई भांग होली में, वो प्याले याद आते हैं
गटर, पी कर गिरे जिनमे, निराले याद आते हैं
दुलत्ती मारते देखूं , गधों को जब ख़ुशी से में
निकम्मे सब मेरे कम्बक्त, साले याद आते हैं
गले लगती हो जब, खाकर कभी आचार लहसुन का
तुम्हारे शहर के गंदे वो नाले याद आते हैं
भगा लाया तेरे घर से, बनाने को तुझे बीवी
पड़े थे अक्ल पे मेरी, वो ताले याद आते हैं
नमूने देखता हूँ जब, अजायब घर में तो यारों
ना जाने क्यूँ मुझे ससुराल वाले याद आते हैं
कभी तो पैंट फाड़ी और कभी सड़कों पर दौड़ाया
तेरी अम्मा ने जो कुत्ते थे पाले याद आते हैं

रचनाकार -
नीरज