करे जब पांव खुद नर्तन, समझ लेना की होली है
हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना की होली है
इमारत एक पुरानी सी, रुके बरसों के पानी सी
लगे बीवी बही नूतन, समझ लेना की होली है
तरसती जिसके भी दीदार तक को आपकी आँखें
उसे छूने का आये छन, समझ लेना की होली है
हमारी जिंदगी यूँ तो है एक,काँटों भरा जंगल
अगर लगने लगे मधुवन, समझ लेना की होली है
कभी खोलो हुलसकर, आप अपने घर का दरवाजा
खड़े ढेअरी पर हो साजन, समझ लेना की होली है
बुलाये जब तुझे वो गीत गाकर ताल पर ढपकी
जिसे माना किये दुश्मन, समझ लेना की होली है
रचनाकार
नीरज
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