पिलाई भांग होली में, वो प्याले याद आते हैं
गटर, पी कर गिरे जिनमे, निराले याद आते हैं
दुलत्ती मारते देखूं , गधों को जब ख़ुशी से में
निकम्मे सब मेरे कम्बक्त, साले याद आते हैं
गले लगती हो जब, खाकर कभी आचार लहसुन का
तुम्हारे शहर के गंदे वो नाले याद आते हैं
भगा लाया तेरे घर से, बनाने को तुझे बीवी
पड़े थे अक्ल पे मेरी, वो ताले याद आते हैं
नमूने देखता हूँ जब, अजायब घर में तो यारों
ना जाने क्यूँ मुझे ससुराल वाले याद आते हैं
कभी तो पैंट फाड़ी और कभी सड़कों पर दौड़ाया
तेरी अम्मा ने जो कुत्ते थे पाले याद आते हैं
रचनाकार -
नीरज
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