Through this blog I have tried to collect various Hindi poems and essays which we grew up reading in our schools.
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
आदर्शं प्रेम
कहकर उसे बताना कया |
अपने को अपर्ण करना पर
और को अपनाना क्या |
गुण का ग्राहक बनना लेकिन
गाकर उसे सुनाना क्या |
मन के कल्पित भावों से
औरों को भ्रम में लाना क्या |
ले लेना सुगन्ध सुमनों की
तोड़ उन्हें मुरझाना क्या |
प्रेम हार पहनाना लेकिन
प्रेम पाश फैलाना क्या |
त्याग अंक में पले प्रेम शिशु
उनमें स्वार्थ बताना क्या |
देकर ह्रदय ह्रदय पाने की
आशा व्यर्थ लगाना क्या |
Harivansh rai bachchan
गुरुवार, 18 मार्च 2010
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
जानता हूँ इस जगत में फूल की है आयु कितनी ,
और यौवन की उभरती साँस में है वायु कितनी ,
आकाश का विस्तार सारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
जोड़ कर कण - कण कृपण आकाश ने तारे
सजाए,जो की उज्ज्वल हैं पर क्या किसी के काम आए ,
प्राण मैं तो मार्ग दर्शक बस एक तारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गयी जैसे दिशाएँ,
एक तरणी एक नाविक और कितनी आपदाएं ,
क्या करूं मझधार में ही मैं किनारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ
राम कुमार वर्मा
गुरुवार, 4 मार्च 2010
गब्बर: होली कब है
हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना की होली है
इमारत एक पुरानी सी, रुके बरसों के पानी सी
लगे बीवी बही नूतन, समझ लेना की होली है
तरसती जिसके भी दीदार तक को आपकी आँखें
उसे छूने का आये छन, समझ लेना की होली है
हमारी जिंदगी यूँ तो है एक,काँटों भरा जंगल
अगर लगने लगे मधुवन, समझ लेना की होली है
कभी खोलो हुलसकर, आप अपने घर का दरवाजा
खड़े ढेअरी पर हो साजन, समझ लेना की होली है
बुलाये जब तुझे वो गीत गाकर ताल पर ढपकी
जिसे माना किये दुश्मन, समझ लेना की होली है
रचनाकार
नीरज
होली की मस्ती
गटर, पी कर गिरे जिनमे, निराले याद आते हैं
दुलत्ती मारते देखूं , गधों को जब ख़ुशी से में
निकम्मे सब मेरे कम्बक्त, साले याद आते हैं
गले लगती हो जब, खाकर कभी आचार लहसुन का
तुम्हारे शहर के गंदे वो नाले याद आते हैं
भगा लाया तेरे घर से, बनाने को तुझे बीवी
पड़े थे अक्ल पे मेरी, वो ताले याद आते हैं
नमूने देखता हूँ जब, अजायब घर में तो यारों
ना जाने क्यूँ मुझे ससुराल वाले याद आते हैं
कभी तो पैंट फाड़ी और कभी सड़कों पर दौड़ाया
तेरी अम्मा ने जो कुत्ते थे पाले याद आते हैं
रचनाकार -
नीरज
मंगलवार, 22 दिसंबर 2009
प्रयाण गीत
हिमाद्रि तुंग शृंग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला
स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के-
रुको न शूर साहसी !
अराति सैन्य सिंधु में, सुवड़वाग्नि से चलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो !
जय शंकर प्रसाद
जलियाँवाला बाग में बसंत
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।
लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।
कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।
सुभद्रा कुमारी चौहान
कदम्ब का पेंड
यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे धीरे
ले देती यदि मुझे तुम बांसुरी दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली
तुम्हें नहीं कुछ कहता, पर मैं चुपके चुपके आता
उस नीची डाली से अम्मां ऊंचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मज़े से मैं बांसुरी बजाता
अम्मां-अम्मां कह बंसी के स्वरों में तुम्हें बुलाता
सुन मेरी बंसी मां, तुम कितना खुश हो जातीं
मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आतीं
तुमको आती देख, बांसुरी रख मैं चुप हो जाता
एक बार मां कह, पत्तों में धीरे से छिप जाता
तुम हो चकित देखती, चारों ओर ना मुझको पातीं
व्याकुल सी हो तब, कदंब के नीचे तक आ जातीं
पत्तों का मरमर स्वर सुनकर,जब ऊपर आंख उठातीं
मुझे देख ऊपर डाली पर, कितनी घबरा जातीं
ग़ुस्सा होकर मुझे डांटतीं, कहतीं नीचे आ जा
पर जब मैं ना उतरता, हंसकर कहतीं मुन्ना राजा
नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्हें मिठाई दूंगी
नये खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी
मैं हंसकर सबसे ऊपर की डाली पर चढ़ जाता
वहीं कहीं पत्तों में छिपकर, फिर बांसुरी बजाता
बुलाने पर भी जब मैं ना उतरकर आता
मां, तब मां का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता
तुम आंचल फैलाकर अम्मां, वहीं पेड़ के नीचे
ईश्वर से विनती करतीं, बैठी आंखें मीचे
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं, धीरे धीरे आता
और तुम्हारे आंचल के नीचे छिप जाता
तुम घबराकर आंख खोलतीं,
और मां खुश हो जातीं
इसी तरह खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे ।।
सुभद्रा कुमारी चौहान