गुरुवार, 18 मार्च 2010

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

जानता हूँ इस जगत में फूल की है आयु कितनी ,

और यौवन की उभरती साँस में है वायु कितनी ,

आकाश का विस्तार सारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

जोड़ कर कण - कण कृपण आकाश ने तारे

सजाए,जो की उज्ज्वल हैं पर क्या किसी के काम आए ,

प्राण मैं तो मार्ग दर्शक बस एक तारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गयी जैसे दिशाएँ,

एक तरणी एक नाविक और कितनी आपदाएं ,

क्या करूं मझधार में ही मैं किनारा चाहता हूँ

मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ

राम कुमार वर्मा

1 टिप्पणी:

  1. कितनी मर्मस्पर्शी कविता है यह ! इस प्रस्तुतिकरण में कुछ अशुद्धियाँ हैं जिन्हें सुधारा जाना चाहिए । हृदय की गहनता में उतार जाने वाला गीत है यह जिसे कोई भी भावुक व्यक्ति एक बार पढ़ / सुन लेने के बाद कभी नहीं भुला सकता ।

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