
वीर ने पायी वीर गति, वीरता ना उसकी सराही गई
तब देश भक्त वीरांगना भी पत्नी उसकी कहलाई गई
आई भाई की याद और माता का नेह उमड़ आया
पत्नी की प्रतिमा आंखों में और हिरदय प्यार से भर आया
कायरता ने कब्जा कर के जब सिथिल अंग कर दिए सभी
अवकाश युध्ध से लेकर के घर पर पंहुचा बह वीर तभी
घर पर देखा निज अर्धांग्नी तन मन से पूजा करती है
और देश विजय के हेतु भाल चंडी चरणों में धरती है
कहती है यही सुहाग मात लाखों की जान बचायेगा
मेरा सिंदूर भले जाए माँ का सिन्दूर ना जाएगा
इतने में द्रष्टि पड़ी पति पर आंखों में खून उतर आया
सर पटक पटक कर वह बोली संग्राम से कैसे घर आया
वह बोला तेरा प्यार पुत्र की ममता मुझे खींच लायी
माता की गोदी खाली थी और बहन की राखी ले आई
पुत्री का नेह उमड़ आया मेरे मन को झुलसाने लगा
और सहोदर भाई का भी प्यार ह्रदय में आने लगा
घबराकर युध से भगा हूँ और जान बचने आया हूँ
अपने सीने में तेरे हित कुछ प्यार छिपा कर लाया हूँ
तब देश भक्त वीरांगना भी सिंहनी की भाति दहाड़ पड़ी
परिवार के प्यारे कायर का मुख देख रहीं हूँ आज खड़ी
माँ आकर तेरा मुख देखे सैकडो मात का क्या होगा
भ्राता यदि तुझसे प्यार करे सैकडो भ्रात का क्या होगा
तेरी एक राखी के बदले सैकडो राखियाँ टूटेंगी
मेरी एक बिंदिया के बदले सैकडो बिंदियाँ छूटेंगी
यदि माँ का प्यार चाहते हो और पुत्री से है नेह तुम्हे
राखी की लाज बचानी यदि और कंचित हमसे प्रेम तुम्हे
यदि मान चाहते बच्चों से तो मैं तुमको बतलाती हूँ
धड से मेरा सर करो छिन्न मैं स्वर्गलोक को जाती हूँ
अतिशीघ्र युध्ध में जा कर के अपना कर्तव्य निभाना तुम
दुश्मन सीना ही देख सके मत उसको पीठ दिखाना तुम
वह वीर बूँद जल पी न सका तट छन ही रण में जा पंहुचा
दुश्मन को मार भगाने लगा और कारगिल में छन में पंहुचा
बस काल मार ही मार उसे हर और दिखाई देती थी
और देश विजय के हेतु स्वयं कालिका बधाई देती थी
फ़िर अपनी कुर्बानी देकर कालिका की प्यास बुझाई गई
फिर देश भक्त वीरांगना भी पत्नी उसकी कहलाई गई