मंगलवार, 30 जून 2009

पुष्प की अभिलाषा


चाह नही मैं सुरबाला के गहनों में गूथा जाऊँ
चाह नही प्रेमी माला में बिंध्य, प्यारी को ललचाऊं

चाह नहीं सम्राटों के शव, पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के शिर पर चढूं भाग्य पर इतराऊं

मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृ भूमि पर शीश चढाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक



माखन लाल चतुर्वेदी

कोशिश करने वाले की हार नही होती


लहरों से डर कर नौका पार नही होती
कोशिश करने बालों की कभी हार नही होती

नन्ही चीटीं दाना लेकर ऊपर चढ़ती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का उत्साह रगों में साहस भरता है
चदकर गिरना, गिरकर चढ़ना नही अखरता है
मेहनत उसकी खाली हर बार नही होती
कोशिश करने बालों की हार नही होती


डुबकियां सिन्धु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नही सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता उसका उत्साह उसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नही होती
कोशिश करने बालों की हार नही होती

असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो
जब तक सफल ना हो नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किए बिना जय जयकार नही होती
कोशिश करने बालों की कभी हार नही होती

हरिवंश राय बच्चन

सोमवार, 29 जून 2009

सेक्रेटरी साहब

एक बार गाँव हमारे सेक्रेटरी साहब आए
नई नई बुक-शर्ट पहन कर नया अचम्भा लाये
पप्पू राजू मुन्नू चिंटू रिंकू सब घिर आए
ब्लाउज ब्लाउज कह कर वो सारे बेहूदे चिल्लाये
हम थे ग्राम प्रधान कहा तुम सब हो बहुत निकम्मा
ब्लाउज नही ये लली कोट है और जैकेट की अम्मा

शुक्रवार, 26 जून 2009

वीर और वीरांगना


वीर ने पायी वीर गति, वीरता ना उसकी सराही गई
तब देश भक्त वीरांगना भी पत्नी उसकी कहलाई गई

आई भाई की याद और माता का नेह उमड़ आया
पत्नी की प्रतिमा आंखों में और हिरदय प्यार से भर आया
कायरता ने कब्जा कर के जब सिथिल अंग कर दिए सभी
अवकाश युध्ध से लेकर के घर पर पंहुचा बह वीर तभी

घर पर देखा निज अर्धांग्नी तन मन से पूजा करती है
और देश विजय के हेतु भाल चंडी चरणों में धरती है
कहती है यही सुहाग मात लाखों की जान बचायेगा
मेरा सिंदूर भले जाए माँ का सिन्दूर ना जाएगा

इतने में द्रष्टि पड़ी पति पर आंखों में खून उतर आया
सर पटक पटक कर वह बोली संग्राम से कैसे घर आया

वह बोला तेरा प्यार पुत्र की ममता मुझे खींच लायी
माता की गोदी खाली थी और बहन की राखी ले आई
पुत्री का नेह उमड़ आया मेरे मन को झुलसाने लगा
और सहोदर भाई का भी प्यार ह्रदय में आने लगा

घबराकर युध से भगा हूँ और जान बचने आया हूँ
अपने सीने में तेरे हित कुछ प्यार छिपा कर लाया हूँ

तब देश भक्त वीरांगना भी सिंहनी की भाति दहाड़ पड़ी
परिवार के प्यारे कायर का मुख देख रहीं हूँ आज खड़ी

माँ आकर तेरा मुख देखे सैकडो मात का क्या होगा
भ्राता यदि तुझसे प्यार करे सैकडो भ्रात का क्या होगा
तेरी एक राखी के बदले सैकडो राखियाँ टूटेंगी
मेरी एक बिंदिया के बदले सैकडो बिंदियाँ छूटेंगी

यदि माँ का प्यार चाहते हो और पुत्री से है नेह तुम्हे
राखी की लाज बचानी यदि और कंचित हमसे प्रेम तुम्हे
यदि मान चाहते बच्चों से तो मैं तुमको बतलाती हूँ
धड से मेरा सर करो छिन्न मैं स्वर्गलोक को जाती हूँ

अतिशीघ्र युध्ध में जा कर के अपना कर्तव्य निभाना तुम
दुश्मन सीना ही देख सके मत उसको पीठ दिखाना तुम


वह वीर बूँद जल पी न सका तट छन ही रण में जा पंहुचा
दुश्मन को मार भगाने लगा और कारगिल में छन में पंहुचा
बस काल मार ही मार उसे हर और दिखाई देती थी
और देश विजय के हेतु स्वयं कालिका बधाई देती थी

फ़िर अपनी कुर्बानी देकर कालिका की प्यास बुझाई गई
फिर देश भक्त वीरांगना भी पत्नी उसकी कहलाई गई

गुरुवार, 25 जून 2009

मुश्किल है अपना मेल प्रिये

मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम ऍम ऐ फर्स्ट डिविजन हो , मैं हुआ मैट्रिक फ़ैल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम फौजी अफसर की बेटी मैं तो किसान का बेटा हूँ
तुम राबड़ी खीर मलाई हो मैं तो सत्तू सपरेटा हूँ
तुम ऐ सी घर में रहती हो मैं पेड़ के नीचे लेटा हूँ
तुम नई मर्सडीज़ लगती हो मैं स्कूटर lamretaa हूँ

इस तरह अगर हम चुप चुप कर आपस में प्रेम बढायेंगे
तो एक रोज तेरे dady अमरीश पुरी बन जायेंगे
सब हड्डी पसली तोड़ मेरी भिजवा देंगे वो जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम अरब देश की घोडी हो मैं हूँ गधे की नाल प्रिये
तुम दीवाली का बोनस हो मैं भूखों की हडताल प्रिये
तुम हीरे जडी तस्तरी हो मैं अलमुनियम का थाल प्रिये
तुम चिकन सूप बिरयानी हो मैं कंकड़ बाली दाल प्रिये
तुम हिरन चौकडी भरती हो मैं हूँ कछुए की चाल प्रिये
तुम चंदन वन की लकड़ी हो मैं हूँ बबूल की छाल प्रिये
मैं पके आम सा लटका हूँ मत मरो मुझे गुलेल प्रिये

मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

मैं शनि देव जैसा कुरूप तुम कोमल कंचन काया हो
मैं तो कांशी राम जैसा तुम महा चंचला माया हो
तुम निर्मल पावन गंगा हो मैं जलता हुआ पतंगा हूँ
तुम राज घाट का शान्ति मार्च मैं हिंदू मुस्लिम दंगा हूँ
तुम हो पूनम का ताजमहल मैं काली गुफा अजंता की
तुम हो वरदान विधाता का मैं गलती हूँ भगवंता की

तुम जेट विमान की सोभा जो मैं बस के ठेलम ठेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम नई विदेशी मिक्सी हो मैं पत्थर का सिल बट्टा हूँ
तूम ए के ४७ जैसी मैं तो एक देसी कट्टा हूँ
तुम चतुर राबड़ी देवी सी मैं भोला भाला लालू हूँ
तुम मुक्त शेरनी जंगल की मैं चिडिया घर का भालू हूँ
तुम ब्यस्त सोनिया गाँधी सी मैं अडवानी सा खाली हूँ
तुम हँसी माधुरी दीक्षित की मैं पुलिस मेन की गाली हूँ


कल जेल अगर हो जाए तो दिलवा देना तुम बेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये


मैं ढावे के ढाँचे जैसा
तुम पाच सितारा होटल हो
मैं महुए का देसी ठर्रा तुम रेड लेबल की बोटेल हो
तुम चित्रहार का मधुर गीत मैं कृषि दर्शन की झाडी हूँ
तुम विश्व सुन्दरी सी कमाल मैं ठिलिया छाप कबाडी हूँ

तुम सोनी का मोबाइल हो मैं टेलीफोन वाला चोंगा
तुम मछली मान सरोवर की मैं सागर तट का हूँ घोंगा

दस मंजिल से गिर जाउंगा मत आगे मुझे धकेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम सत्ता की महारानी हो मैं विपछ की लाचारी हूँ
तुम हो ममता जयललिता सी मैं कुवारा अटल बिहारी हूँ
तुम तेंदुलकर का सतक प्रिये मैं फालो आन की पारी हूँ
तुम गेट्स मटीज कोरोला हो मैं तो लीलेंड की लारी हूँ
मुझको रेफरी ही रहने दो मत खेलो मुझसे खेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

मैं सोच रहा की रहे हैं कबसे श्रोता मुझको झेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये








मट्ठे की चाय

श्रीमती से किया निवेदन बना दीजिये चाय
वो बोली घर मैं दूध नहीं है लगा लीजिये गाय

मैं बोला चल बेहूदी करती है मुझसे ठट्ठा
दूध नही यदि तेरे घर में डाल चाय में मट्ठा

मट्ठा कहीं चाय में पड़ता हंसकर बोले मित्र रवि
हमने कहा तमीज न तुमको हम नवयुग के नए कवि

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खुबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बाँहों में पा के
कभी नींद मैं मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद मैं कसमसा कसमसा कर
सिरहाने से तकिये गिराती तो होगी

वोही ख्वाब दिन की मुंडेरों पे आके
उसे मन ही मन मैं लुभाते तो होंगे
कई साज़ सीने की खामोशिओं मैं
मेरी याद से झनझनाते तो होंगे
वो बेसाख्ता धीमे धीमे सुरों मैं
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी

चलो ख़त लिखें जी मैं आता तो होगा
मगर उँगलियाँ कंपकपाती तो होंगीं
कलम हाथ से छूट जाता तो होगा
उमंगें कलम फिर उठती तो होंगी
मेरा नाम अपनी किताबों पे लिख कर
वो दांतों मैं ऊँगली दबाती तो होगी

जुबान से कभी उफ़ निकलती तो होगी
बदन धीमे धीमे दहकता तो होगा
कहीं के कहीं पांव पड़ते तो होंगे
बदन पे दुपट्टा लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बताती तो होगी
कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खुबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बाँहों मैं पा के
कभी नींद मैं मुस्कुराती तो होगी

बुधवार, 24 जून 2009

बता ए यार क्या लिक्खूं

समझ में कुछ नहीं आता बता मैं यार क्या लिक्खूं
ग़मों की दास्ताँ लिक्खूं खुशी की या कथा लिक्खूं

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहां मौजूद पाता हूँ
अगर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूं

गणित ये प्यार यारों का किसी के तो समझ आए
सिफर बचाता अगर तुझको कभी ख़ुद से घटा लिक्खूं

अगर मुजरिम बना हाकिम कहेगा बह यही सबसे
लुटेरे यार हैं मेरे मैं अब किसको सजा लिक्खूं

किए तुने बहुत अहसान कहाँ इनकार है मुझको
गवारा पर नही ए दोस्त मैं तुझको खुदा लिक्खूं



नीरज गोस्वामी

मेरे आदरणीय बाबू जी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज , सब जेबर थे बाबु जी

भीतर से खालिस जज्बाती और ऊपर से थेट पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा एक तेबर थे बाबु जी

कभी बड़ा सा हाथ कर्च थे , कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबु जी

राधिका का प्रेम तो था बांसुरी की तान से


क्या तुम्हे शब्दों में हम बतलाएं , हमको क्या मिला
गुरु ग्रन्थ साहिब , बाइबल , गीता और कुरान से

चाहता और पूजता जिनको रहा मैं उम्र भर
आज मेरे पास से गुजरे बही अनजान से

दोस्ती हरगिज़ ना करिए ऐसे लोगों से कभी
आँख से सुनते हैं जो और देखते हैं कान से

कल तलक खूंखार डाकू और हत्यारा था जो
देखिये बैठा है वो संसद में कितनी शान से

कृष्ण को तो व्यर्थ ही बदनाम सबने कर दिया
राधिका का प्रेम तो था बांसुरी की तान से

धर्म से करते हो जैसे जात से परिवार से
वैसे थोड़ा प्यार करिए अपने हिन्दुस्तान से

पूछिए मत चाँद सूरज छिप गए जा कर कहाँ
डर गए है जुगनुओं के तुगलकी फरमान से

दिल का टुकडा दे रहा है शुक्र उसका कीजिये
दान कोई भी बड़ा होता ना कन्या दान से

नीरज गोस्वामी

मेरी प्यारी अम्मा


घर में झीने रिश्ते मैंने , लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा

सारे रिश्ते जेठ दुपहरी , गर्म हवा आतिश अंगारे
झरना दरिया झील समंदर भीनी सी पुरवाई अम्मा

बाबु जी गुजरे , सब चीज़ें तकसीम हुईं तब
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा