गुरुवार, 25 जून 2009

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खुबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बाँहों में पा के
कभी नींद मैं मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद मैं कसमसा कसमसा कर
सिरहाने से तकिये गिराती तो होगी

वोही ख्वाब दिन की मुंडेरों पे आके
उसे मन ही मन मैं लुभाते तो होंगे
कई साज़ सीने की खामोशिओं मैं
मेरी याद से झनझनाते तो होंगे
वो बेसाख्ता धीमे धीमे सुरों मैं
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी

चलो ख़त लिखें जी मैं आता तो होगा
मगर उँगलियाँ कंपकपाती तो होंगीं
कलम हाथ से छूट जाता तो होगा
उमंगें कलम फिर उठती तो होंगी
मेरा नाम अपनी किताबों पे लिख कर
वो दांतों मैं ऊँगली दबाती तो होगी

जुबान से कभी उफ़ निकलती तो होगी
बदन धीमे धीमे दहकता तो होगा
कहीं के कहीं पांव पड़ते तो होंगे
बदन पे दुपट्टा लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बताती तो होगी
कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खुबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बाँहों मैं पा के
कभी नींद मैं मुस्कुराती तो होगी

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