अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज , सब जेबर थे बाबु जी
भीतर से खालिस जज्बाती और ऊपर से थेट पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा एक तेबर थे बाबु जी
कभी बड़ा सा हाथ कर्च थे , कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबु जी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें