समझ में कुछ नहीं आता बता मैं यार क्या लिक्खूं
ग़मों की दास्ताँ लिक्खूं खुशी की या कथा लिक्खूं
जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहां मौजूद पाता हूँ
अगर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूं
गणित ये प्यार यारों का किसी के तो समझ आए
सिफर बचाता अगर तुझको कभी ख़ुद से घटा लिक्खूं
अगर मुजरिम बना हाकिम कहेगा बह यही सबसे
लुटेरे यार हैं मेरे मैं अब किसको सजा लिक्खूं
किए तुने बहुत अहसान कहाँ इनकार है मुझको
गवारा पर नही ए दोस्त मैं तुझको खुदा लिक्खूं
नीरज गोस्वामी
I would like you to recite this poem to me...
जवाब देंहटाएं