मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

प्रयाण गीत

हिमाद्रि तुंग शृंग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला
स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के-
रुको न शूर साहसी !
अराति सैन्य सिंधु में, सुवड़वाग्नि से चलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो !

जय शंकर प्रसाद

जलियाँवाला बाग में बसंत

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।
ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।
कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।
किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।
तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।
यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

सुभद्रा कुमारी चौहान

कदम्ब का पेंड


यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्‍हैया बनता धीरे धीरे
ले देती यदि मुझे तुम बांसुरी दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली


तुम्‍हें नहीं कुछ कहता, पर मैं चुपके चुपके आता
उस नीची डाली से अम्‍मां ऊंचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मज़े से मैं बांसुरी बजाता
अम्‍मां-अम्‍मां कह बंसी के स्‍वरों में तुम्‍हें बुलाता


सुन मेरी बंसी मां, तुम कितना खुश हो जातीं
मुझे देखने काम छोड़कर, तुम बाहर तक आतीं
तुमको आती देख, बांसुरी रख मैं चुप हो जाता
एक बार मां कह, पत्‍तों में धीरे से छिप जाता


तुम हो चकित देखती, चारों ओर ना मुझको पातीं
व्‍या‍कुल सी हो तब, कदंब के नीचे तक आ जातीं
पत्‍तों का मरमर स्‍वर सुनकर,जब ऊपर आंख उठातीं
मुझे देख ऊपर डाली पर, कितनी घबरा जातीं


ग़ुस्‍सा होकर मुझे डांटतीं, कहतीं नीचे आ जा
पर जब मैं ना उतरता, हंसकर कहतीं मुन्‍ना राजा
नीचे उतरो मेरे भैया, तुम्‍हें मिठाई दूंगी
नये खिलौने-माखन-मिश्री-दूध-मलाई दूंगी


मैं हंसकर सबसे ऊपर की डाली पर चढ़ जाता
वहीं कहीं पत्‍तों में छिपकर, फिर बांसुरी बजाता
बुलाने पर भी जब मैं ना उतरकर आता
मां, तब मां का हृदय तुम्‍हारा बहुत विकल हो जाता


तुम आंचल फैलाकर अम्‍मां, वहीं पेड़ के नीचे
ईश्‍वर से विनती करतीं, बैठी आंखें मीचे
तुम्‍हें ध्‍यान में लगी देख मैं, धीरे धीरे आता
और तुम्हारे आंचल के नीचे छिप जाता


तुम घबराकर आंख खोलतीं,
और मां खुश हो जातीं
इसी तरह खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर मां होता जमना तीरे ।।

सुभद्रा कुमारी चौहान

मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

तुलसी और रत्ना

तन पुलकित था तुलसी का, सोचा विनोद में आकर
मैं सावधान कर दूंगा , रत्ना को घर पर जा कर
इस गोधूली वेला में, वदराह बादलों के दल
आये हैं आज चुराने, तेरे नयनो का काजल

पर घर जा कर तुलसी का, बढ़ गया विरह दूना था
अन्दर बाहर क्या घर का, कोना कोना सूना था
रत्ना चिल्लाये तुलसी, पगलों से मतवालों से
पर ध्वनि प्रति-ध्वनि बन लौटी, टकरा कर दीवारों से

फूल और काँटा

हैं जन्म लेते जगह में एक ही,
एक ही पौधा उन्हें है पालता
रात में उन पर चमकता चांद भी,
एक ही सी चांदनी है डालता ।
मेह उन पर है बरसता एक सा,
एक सी उन पर हवाएँ हैं बहीं
पर सदा ही यह दिखाता है हमें,
ढंग उनके एक से होते नहीं ।
छेदकर काँटा किसी की उंगलियाँ,
फाड़ देता है किसी का वर वसन
प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर,
भँवर का है भेद देता श्याम तन ।
फूल लेकर तितलियों को गोद में
भँवर को अपना अनूठा रस पिला,
निज सुगन्धों और निराले ढंग से
है सदा देता कली का जी खिला ।
है खटकता एक सबकी आँख में
दूसरा है सोहता सुर शीश पर,
किस तरह कुल की बड़ाई काम
दे जो किसी में हो बड़प्पन की कसर ।

रचनाकार: अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

एक तिनका

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ,
एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा।
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा।
मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूँठ देने लोग कपड़े की लगे,
ऐंठ बेचारी दबे पॉंवों भागने लगी।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया,
तब 'समझ' ने यों मुझे ताने दिए।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

रचनाकार: अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

एक बूँद

ज्यों निकलकर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फ़िर फ़िर यही मन में लगी
आह क्यूँ घर छोड़कर मैं यों बढ़ी

देव मेरे भाग्य मैं है क्या वदा
मैं बचूंगी या मिलूँगी धूल में
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी
चू पडूँगी या कमल के फूल में

वह गई उस काल कुछ ऐसी हवा
वह समुन्दर ओर आई अनमनी
एक सुंदर सीप का मुंह था खुला
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी

लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर
किंतु घर का छोड़ना अकसर उन्हे
बूँद लौ कुछ और ही देता है कर

अयोध्या सिंह हरिऔध

मुरझाया फूल


था कली के रूप शैशव में, अहो सूखे सुमन

हास्य करता था, खिलाती अंक में तुझको पवन

खिल गया जब पूर्ण तू मंजुल, सुकोमल पुष्पवर

लुब्ध मधु के हेतु मँडराने लगे आने भ्रमर


स्निग्ध किरनें चाँद की, तुझको हंसाती थी सदा,

रात तुझ पर वारती थी मोतियों की संपदा

लोरियां गा कर मधुप निद्रा-विवश करते तुझे

यत्न माली का रहा आनंद से भरता तुझे


कर रहा अठखेलियाँ इतरा रहा उद्यान में

अंत का ये दृश्य आया था कभी क्या ध्यान में?

सो रहा अब तू धरा पर, शुष्क बिखराया हुआ

गंध कोमलता नहीं, मुख मंजु मुरझाया हुआ


आज तुझको देखकर चाहक भ्रमर आता नहीं

लाल अपना राग तुझपर प्रात बरसाता नहीं

जिस पवन ने अंक में ले प्यार तुझको था किया

तीव्र झोकों से सुला उसने तूझे भू पर दिया


कर दिया मधु और सौरभ दान सारा एक दिन

किंतु रोता कौन हैं तेरे लिए दानी सुमन

मत व्यथित हो फूल, सुख किसको दिया संसार ने

स्वार्थमय सबको बनाया है यहाँ करतार ने


विश्व मैं हे फूल! तू सबके ह्रदय भाता रहा

दान कर सर्वस्व फ़िर भी हाय! हर्साता रहा

जब ना तेरी ही दशा पर दुःख हुआ संसार को

कौन रोयेगा सुमन हमसे मनुज निःसार को


महादेवी वर्मा

बुधवार, 12 अगस्त 2009

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

प्रिय मित्रों स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में....................


सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।

करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।

रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।

यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।

खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद, आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
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रहबर - Guide
लज्जत - tasteful
नवर्दी - Battle
मौकतल - Place Where Executions Take Place, Place of Killing मिल्लत - Nation, faith

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Many people have asked me about the lyrics used in the movie 'Rang De Basanti'. Here it goes -- though remember these lines are not part of the original poem written by 'Ram Prasad Bismil'.

है लिये हथियार दुश्मन ताक मे बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिनमें हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से और भडकेगा जो शोला सा हमारे दिल में है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न जान हथेली में लिये लो बढ चले हैं ये कदम जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल मैं है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब होश दुश्मन के उडा देंगे हमे रोको न आज दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल मे है सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


पंडित राम प्रसाद बिस्मिल

देश की धरती



मन समर्पित, तन समर्पित
और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

मॉं तुम्हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल में जब भी
कर दया स्वीकार लेना यह समर्पण

गान अर्पित, प्राण अर्पित
रक्त का कण-कण समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

मॉंज दो तलवार को, लाओ न देरी
बॉंध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी
शीश पर आशीष की छाया धनेरी

स्वप्न अर्पित, प्रश्न अर्पित
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ

तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो
गॉंव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो

सुमन अर्पित, चमन अर्पित
नीड़ का तृण-तृण समर्पित
चहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ


राम अवतार त्यागी

शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

मेरा नया बचपन


बार बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी |
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी ||
चिंता रहित खेलना खाना वह फिरना निर्भय स्वछंद?
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

उंच नीच का ज्ञान नही था , छुआ छूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहां झोपडी और चीथड़ों में रानी ||
किए दूध के कुल्ले मैंने चूस अंगूठा सुधा पीया |
किलकारी किल्लोर मचाकर सूना घर आबाद किया ||

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे |
बड़े बड़े मोती से आंसू जय माला पहनाते थे ||
मैं रोई, मां काम छोड़कर आई, मुझको उठा लिया |
झाड़ फूंक कर चूम चूम गीले गलों को सुखा दिया ||


दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर- युत दमक उठे |
धुली हुई मुस्कान देखकर सबके चहरे चमक उठे ||
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई |
लुटी हुई कुछ ठगी हुई सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई ||


लाज भरी आँखें थी मेरी मन में उमंग रंगीली थी |
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी ||
मन में एक उमंग सी भी थी ये दुनिया अलबेली थी |
दिल में एक चुभन सी थी मैं सबके बीच अकेली थी ||

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने |
अरे जवानी के फंदे में मुझको फंसा दिया तूने ||
सब गलियां उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं |
प्यारे प्रीतम की स्म्रतियों की रंग रलियाँ भी प्यारी है ||

माना मैंने युवा काल का जीवन खूब निराला है |
आकांशा पुरुसार्थ ज्ञान का उदय मोहने वाला है
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध छेत्र संसार बना |
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना ||

आ जा बचपन ! एक बार फ़िर दे दे अपनी निर्मल शान्ति |
व्याकुल व्यथा मिटाने वाली बह अपनी प्राकृत विश्रांति ||
वह भूली सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप |
क्या आकर फ़िर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?


मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी |
नंदन वन सी फूल उठी वह नन्ही सी कुटिया मेरी ||
'मां ओ' कह कर बुला रही थी मिटटी खा कर आई थी |
कुछ मुह में कुछ लिए हाथ में मुझे खिलाने आई थी ||

पुलक रहे थे अंग द्रगों में कौतुहल था छलक रहा |
मुहं पर थी आह्लाद लालिमा विजय गर्व था झलक रहा ||

मैंने पूछा ये क्या लाई बोल उठी 'माँ काओ' |
हुआ प्रफुल्लित ह्रदय खुशी से मैंने कहा-' तुम्ही खाओ' ||

पाया मैंने बचपन फ़िर से बचपन बेटी बन आया |
उसकी मंजुल मूर्ती देख कर मुझ में नव जीवन आया ||

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ |
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ ||

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया |
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फ़िर से आया ||


सुभद्रा कुमारी चौहान

बहन की राखी


रोली अक्षत से भरा हुआ एक सुंदर थाल था सजवाया
चौमुखा जलाकर दीप भी था एक सुंदर ढंग से रखवाया
वोली बेटी तू भी आ जा, सीमा पर भइया जाता है
भारत मां की रक्षा के हित वह दृढ संकल्प उठाता है

आओ हम उसका तिलक करें, वह भगत सिंह बन जाएगा
नेता सुभाष सा बन कर वह भारत की लाज बचायेगा


ये सुनकर बेटा कूद पड़ा, रण में मैं प्रलय मचाउंगा
माता तुम मत हो अधीर में तेरा दूध चुकाउंगा


कायर बन कर जीना भी क्या ,जीना भी कोई जीना है
सीने पर जिसके बाल नहीं क्या वह भी कोई सीना है
कर में जिसके तलवार नहीं, कर नहीं वह एक खिलौना है
है देश से जिसको प्यार नहीं इंसान नहीं वह छौना है

यह सुनकर बेटी वोल पड़ी मेरी राखी वह बंधन है
दुश्मन के शिर का काल है यह, और भारत माँ का चंदन है
कर रही तिलक भइया तेरे जा तुझ पर आंच ना आयेगी
भारत मां की रक्षा के हेतु रण चंडी साथ निभाएगी

बहन से राखी बंधवाकर निज ग्राम को शीश नवाता है
इस तरह विदा मां बहन से ले वह देश दीवाना जाता है

मंगलवार, 30 जून 2009

पुष्प की अभिलाषा


चाह नही मैं सुरबाला के गहनों में गूथा जाऊँ
चाह नही प्रेमी माला में बिंध्य, प्यारी को ललचाऊं

चाह नहीं सम्राटों के शव, पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के शिर पर चढूं भाग्य पर इतराऊं

मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृ भूमि पर शीश चढाने जिस पथ जाएँ वीर अनेक



माखन लाल चतुर्वेदी

कोशिश करने वाले की हार नही होती


लहरों से डर कर नौका पार नही होती
कोशिश करने बालों की कभी हार नही होती

नन्ही चीटीं दाना लेकर ऊपर चढ़ती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का उत्साह रगों में साहस भरता है
चदकर गिरना, गिरकर चढ़ना नही अखरता है
मेहनत उसकी खाली हर बार नही होती
कोशिश करने बालों की हार नही होती


डुबकियां सिन्धु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नही सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता उसका उत्साह उसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नही होती
कोशिश करने बालों की हार नही होती

असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
क्या कमी रह गई देखो और सुधार करो
जब तक सफल ना हो नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किए बिना जय जयकार नही होती
कोशिश करने बालों की कभी हार नही होती

हरिवंश राय बच्चन

सोमवार, 29 जून 2009

सेक्रेटरी साहब

एक बार गाँव हमारे सेक्रेटरी साहब आए
नई नई बुक-शर्ट पहन कर नया अचम्भा लाये
पप्पू राजू मुन्नू चिंटू रिंकू सब घिर आए
ब्लाउज ब्लाउज कह कर वो सारे बेहूदे चिल्लाये
हम थे ग्राम प्रधान कहा तुम सब हो बहुत निकम्मा
ब्लाउज नही ये लली कोट है और जैकेट की अम्मा

शुक्रवार, 26 जून 2009

वीर और वीरांगना


वीर ने पायी वीर गति, वीरता ना उसकी सराही गई
तब देश भक्त वीरांगना भी पत्नी उसकी कहलाई गई

आई भाई की याद और माता का नेह उमड़ आया
पत्नी की प्रतिमा आंखों में और हिरदय प्यार से भर आया
कायरता ने कब्जा कर के जब सिथिल अंग कर दिए सभी
अवकाश युध्ध से लेकर के घर पर पंहुचा बह वीर तभी

घर पर देखा निज अर्धांग्नी तन मन से पूजा करती है
और देश विजय के हेतु भाल चंडी चरणों में धरती है
कहती है यही सुहाग मात लाखों की जान बचायेगा
मेरा सिंदूर भले जाए माँ का सिन्दूर ना जाएगा

इतने में द्रष्टि पड़ी पति पर आंखों में खून उतर आया
सर पटक पटक कर वह बोली संग्राम से कैसे घर आया

वह बोला तेरा प्यार पुत्र की ममता मुझे खींच लायी
माता की गोदी खाली थी और बहन की राखी ले आई
पुत्री का नेह उमड़ आया मेरे मन को झुलसाने लगा
और सहोदर भाई का भी प्यार ह्रदय में आने लगा

घबराकर युध से भगा हूँ और जान बचने आया हूँ
अपने सीने में तेरे हित कुछ प्यार छिपा कर लाया हूँ

तब देश भक्त वीरांगना भी सिंहनी की भाति दहाड़ पड़ी
परिवार के प्यारे कायर का मुख देख रहीं हूँ आज खड़ी

माँ आकर तेरा मुख देखे सैकडो मात का क्या होगा
भ्राता यदि तुझसे प्यार करे सैकडो भ्रात का क्या होगा
तेरी एक राखी के बदले सैकडो राखियाँ टूटेंगी
मेरी एक बिंदिया के बदले सैकडो बिंदियाँ छूटेंगी

यदि माँ का प्यार चाहते हो और पुत्री से है नेह तुम्हे
राखी की लाज बचानी यदि और कंचित हमसे प्रेम तुम्हे
यदि मान चाहते बच्चों से तो मैं तुमको बतलाती हूँ
धड से मेरा सर करो छिन्न मैं स्वर्गलोक को जाती हूँ

अतिशीघ्र युध्ध में जा कर के अपना कर्तव्य निभाना तुम
दुश्मन सीना ही देख सके मत उसको पीठ दिखाना तुम


वह वीर बूँद जल पी न सका तट छन ही रण में जा पंहुचा
दुश्मन को मार भगाने लगा और कारगिल में छन में पंहुचा
बस काल मार ही मार उसे हर और दिखाई देती थी
और देश विजय के हेतु स्वयं कालिका बधाई देती थी

फ़िर अपनी कुर्बानी देकर कालिका की प्यास बुझाई गई
फिर देश भक्त वीरांगना भी पत्नी उसकी कहलाई गई

गुरुवार, 25 जून 2009

मुश्किल है अपना मेल प्रिये

मुश्किल है अपना मेल प्रिये
ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम ऍम ऐ फर्स्ट डिविजन हो , मैं हुआ मैट्रिक फ़ैल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम फौजी अफसर की बेटी मैं तो किसान का बेटा हूँ
तुम राबड़ी खीर मलाई हो मैं तो सत्तू सपरेटा हूँ
तुम ऐ सी घर में रहती हो मैं पेड़ के नीचे लेटा हूँ
तुम नई मर्सडीज़ लगती हो मैं स्कूटर lamretaa हूँ

इस तरह अगर हम चुप चुप कर आपस में प्रेम बढायेंगे
तो एक रोज तेरे dady अमरीश पुरी बन जायेंगे
सब हड्डी पसली तोड़ मेरी भिजवा देंगे वो जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम अरब देश की घोडी हो मैं हूँ गधे की नाल प्रिये
तुम दीवाली का बोनस हो मैं भूखों की हडताल प्रिये
तुम हीरे जडी तस्तरी हो मैं अलमुनियम का थाल प्रिये
तुम चिकन सूप बिरयानी हो मैं कंकड़ बाली दाल प्रिये
तुम हिरन चौकडी भरती हो मैं हूँ कछुए की चाल प्रिये
तुम चंदन वन की लकड़ी हो मैं हूँ बबूल की छाल प्रिये
मैं पके आम सा लटका हूँ मत मरो मुझे गुलेल प्रिये

मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

मैं शनि देव जैसा कुरूप तुम कोमल कंचन काया हो
मैं तो कांशी राम जैसा तुम महा चंचला माया हो
तुम निर्मल पावन गंगा हो मैं जलता हुआ पतंगा हूँ
तुम राज घाट का शान्ति मार्च मैं हिंदू मुस्लिम दंगा हूँ
तुम हो पूनम का ताजमहल मैं काली गुफा अजंता की
तुम हो वरदान विधाता का मैं गलती हूँ भगवंता की

तुम जेट विमान की सोभा जो मैं बस के ठेलम ठेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम नई विदेशी मिक्सी हो मैं पत्थर का सिल बट्टा हूँ
तूम ए के ४७ जैसी मैं तो एक देसी कट्टा हूँ
तुम चतुर राबड़ी देवी सी मैं भोला भाला लालू हूँ
तुम मुक्त शेरनी जंगल की मैं चिडिया घर का भालू हूँ
तुम ब्यस्त सोनिया गाँधी सी मैं अडवानी सा खाली हूँ
तुम हँसी माधुरी दीक्षित की मैं पुलिस मेन की गाली हूँ


कल जेल अगर हो जाए तो दिलवा देना तुम बेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये


मैं ढावे के ढाँचे जैसा
तुम पाच सितारा होटल हो
मैं महुए का देसी ठर्रा तुम रेड लेबल की बोटेल हो
तुम चित्रहार का मधुर गीत मैं कृषि दर्शन की झाडी हूँ
तुम विश्व सुन्दरी सी कमाल मैं ठिलिया छाप कबाडी हूँ

तुम सोनी का मोबाइल हो मैं टेलीफोन वाला चोंगा
तुम मछली मान सरोवर की मैं सागर तट का हूँ घोंगा

दस मंजिल से गिर जाउंगा मत आगे मुझे धकेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

तुम सत्ता की महारानी हो मैं विपछ की लाचारी हूँ
तुम हो ममता जयललिता सी मैं कुवारा अटल बिहारी हूँ
तुम तेंदुलकर का सतक प्रिये मैं फालो आन की पारी हूँ
तुम गेट्स मटीज कोरोला हो मैं तो लीलेंड की लारी हूँ
मुझको रेफरी ही रहने दो मत खेलो मुझसे खेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये

मैं सोच रहा की रहे हैं कबसे श्रोता मुझको झेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये ,ये प्यार नही है खेल प्रिये








मट्ठे की चाय

श्रीमती से किया निवेदन बना दीजिये चाय
वो बोली घर मैं दूध नहीं है लगा लीजिये गाय

मैं बोला चल बेहूदी करती है मुझसे ठट्ठा
दूध नही यदि तेरे घर में डाल चाय में मट्ठा

मट्ठा कहीं चाय में पड़ता हंसकर बोले मित्र रवि
हमने कहा तमीज न तुमको हम नवयुग के नए कवि

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की

कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खुबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बाँहों में पा के
कभी नींद मैं मुस्कुराती तो होगी
उसी नींद मैं कसमसा कसमसा कर
सिरहाने से तकिये गिराती तो होगी

वोही ख्वाब दिन की मुंडेरों पे आके
उसे मन ही मन मैं लुभाते तो होंगे
कई साज़ सीने की खामोशिओं मैं
मेरी याद से झनझनाते तो होंगे
वो बेसाख्ता धीमे धीमे सुरों मैं
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी

चलो ख़त लिखें जी मैं आता तो होगा
मगर उँगलियाँ कंपकपाती तो होंगीं
कलम हाथ से छूट जाता तो होगा
उमंगें कलम फिर उठती तो होंगी
मेरा नाम अपनी किताबों पे लिख कर
वो दांतों मैं ऊँगली दबाती तो होगी

जुबान से कभी उफ़ निकलती तो होगी
बदन धीमे धीमे दहकता तो होगा
कहीं के कहीं पांव पड़ते तो होंगे
बदन पे दुपट्टा लटकता तो होगा
कभी सुबह को शाम कहती तो होगी
कभी रात को दिन बताती तो होगी
कहीं एक मासूम नाज़ुक सी लड़की
बहुत खुबसूरत मगर सांवली सी
मुझे अपने ख्वाबों की बाँहों मैं पा के
कभी नींद मैं मुस्कुराती तो होगी

बुधवार, 24 जून 2009

बता ए यार क्या लिक्खूं

समझ में कुछ नहीं आता बता मैं यार क्या लिक्खूं
ग़मों की दास्ताँ लिक्खूं खुशी की या कथा लिक्खूं

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहां मौजूद पाता हूँ
अगर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूं

गणित ये प्यार यारों का किसी के तो समझ आए
सिफर बचाता अगर तुझको कभी ख़ुद से घटा लिक्खूं

अगर मुजरिम बना हाकिम कहेगा बह यही सबसे
लुटेरे यार हैं मेरे मैं अब किसको सजा लिक्खूं

किए तुने बहुत अहसान कहाँ इनकार है मुझको
गवारा पर नही ए दोस्त मैं तुझको खुदा लिक्खूं



नीरज गोस्वामी

मेरे आदरणीय बाबू जी

अब तो उस सूने माथे पर कोरेपन की चादर है
अम्मा जी की सारी सजधज , सब जेबर थे बाबु जी

भीतर से खालिस जज्बाती और ऊपर से थेट पिता
अलग अनूठा अनबूझा सा एक तेबर थे बाबु जी

कभी बड़ा सा हाथ कर्च थे , कभी हथेली की सूजन
मेरे मन का आधा साहस आधा डर थे बाबु जी

राधिका का प्रेम तो था बांसुरी की तान से


क्या तुम्हे शब्दों में हम बतलाएं , हमको क्या मिला
गुरु ग्रन्थ साहिब , बाइबल , गीता और कुरान से

चाहता और पूजता जिनको रहा मैं उम्र भर
आज मेरे पास से गुजरे बही अनजान से

दोस्ती हरगिज़ ना करिए ऐसे लोगों से कभी
आँख से सुनते हैं जो और देखते हैं कान से

कल तलक खूंखार डाकू और हत्यारा था जो
देखिये बैठा है वो संसद में कितनी शान से

कृष्ण को तो व्यर्थ ही बदनाम सबने कर दिया
राधिका का प्रेम तो था बांसुरी की तान से

धर्म से करते हो जैसे जात से परिवार से
वैसे थोड़ा प्यार करिए अपने हिन्दुस्तान से

पूछिए मत चाँद सूरज छिप गए जा कर कहाँ
डर गए है जुगनुओं के तुगलकी फरमान से

दिल का टुकडा दे रहा है शुक्र उसका कीजिये
दान कोई भी बड़ा होता ना कन्या दान से

नीरज गोस्वामी

मेरी प्यारी अम्मा


घर में झीने रिश्ते मैंने , लाखों बार उधड़ते देखे
चुपके चुपके कर देती है जाने कब तुरपाई अम्मा

सारे रिश्ते जेठ दुपहरी , गर्म हवा आतिश अंगारे
झरना दरिया झील समंदर भीनी सी पुरवाई अम्मा

बाबु जी गुजरे , सब चीज़ें तकसीम हुईं तब
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से आई अम्मा